जेल से बाहर आया राजीव गांधी का हत्यारा पेरारिवलन, जाने क्या है अनुच्छेद 142 ? जिसके तहत रिहा हुआ पेरारिवलन
राजीव गांधी की का हत्यारा पेरारिवलन को रिहा करने का आदेश देते हुए सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने कहा है, ‘राज्य मंत्रिमंडल ने प्रासंगिक विचार-विमर्श के आधार पर यह फैसला किया था। अनुच्छेद 142 Article142 का इस्तेमाल करते हुए, दोषी को रिहा किया जाना उचित होगा।
क्या है अनुच्छेद 142, सुप्रीम कोर्ट को कैसे मिलता हैं विशेषाधिकार?
अनुच्छेद 142 (Article 142) भारतीय संविधान के भाग 5 (संघ) के अध्याय 4 (संघ की न्यायपालिका) के अंतर्गत आता है।
संविधान का यह अनुच्छेद सुप्रीम कोर्ट को विशेषाधिकार देता है, जिसके तहत किसी मामले में कोई अन्य कानून लागू ना होने तक उसका फैसला सर्वोपरि माना जाता है।
अनुच्छेद 142 (Article 142) को दो भागों में बंटा है- अनुच्छेद 142(1) में सुप्रीम कोर्ट को यह विशेषाधिकार दिया गया है कि उसके सामने आए कोई मामले में फैसला देते वक्त लगे कि मौजूदा कानून और कानूनी प्रक्रिया के तहत वह पूर्ण न्याय नहीं कर सकता है तो स्थापित विधि से हटकर भी आदेश पारित कर सकता है।
आर्टिकल 142(1) यह साफ कहता है कि सुप्रीम कोर्ट का वह अलग तरह का आदेश तब तक पूरे देश में संसद से पारित कानून की तरह ही लागू रहेगा जब तक कि इस संबंध में सरकार या संसद विशेष उपबंध नहीं कर दे।
अनुच्छेद(Article) 142(2) में सुप्रीम कोर्ट( Supremecourt) को किसी व्यक्ति को बुलाने, डॉक्युमेंट्स मंगाने के साथ-साथ अपनी अवमानना के मामले की जांच करने या दोषी को दंडित करने को लेकर आदेश पारित करने का विशेषाधिकार होगा।
यानी, अनुच्छेद(Article) 142(1) जहां सुप्रीम कोर्ट को फरियादी के मामले में तो 142(2) उसके खुद के मामले में विशेष आदेश पारित करने का अधिकार देता है। इस तरह देखें तो सुप्रीम कोर्ट ने पेरारिवलन की रिहाई का आदेश देते वक्त अनुच्छेद(Article) 142(1) के तहत मिले विशेषाधिकार का प्रयोग किया है।
21 मई 1991 को हुई थी हत्या
तमिलनाडु के श्रीपेरंबदूर में 21 मई 1991 को एक चुनावी रैली के दौरान एक महिला आत्मघाती हमलावर ने खुद को विस्फोट से उड़ा लिया था।
जिसमें पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी मारे गए थे। महिला की पहचान धनु के तौर पर हुई थी। 11 मई 1999 को सुप्रीम कोर्ट (Supreme court) ने 19 दोषियों को बरी कर दिया।
चार दोषि मुरुगन, संथन, पेरारिवलन और नलिनी की मौत की सजा को बरकरार रखा और 3 दोषियों- रॉबर्ट पयास, जयकुमार और रविचंद्रन की मौत की सजा को उम्रकैद में तब्दील कर दिया।
8 अक्टूबर 1999 को सुप्रीम कोर्ट ने मौत की सजा पाए चारों दोषियों की अपील को भी खारिज कर दिया। शीर्ष अदालत ने 18 फरवरी 2014 को पेरारिवलन, संथन और मुरुगन की मौत की सजा को उम्रकैद में तब्दील कर दिया था।
कोर्ट ने केंद्र सरकार के उनकी दया याचिकाओं के निपटारे में 11 साल की देरी के आधार पर फांसी की सजा को उम्रकैद में बदलने का निर्णय लिया।
मामले में आया पेच
उम्रकैद की सजा हुई तो रिहाई की मांग उठने लगी। तमिलनाडु के मुख्यमंत्री स्टालिन ने सभी हत्यारों को 30 साल की सजा काटने के बाद रिहाई की मांग की।
राष्ट्रपति को चिट्ठी लिखी गई। इधर, राज्य मंत्रिमंडल ने फैसला किया और तमिलनाडु के राज्यपाल से सिफारिश की गई। लेकिन गवर्नर ने फाइल राष्ट्रपति के पास दिल्ली भेज दी और मामला लटक गया।
कैदी, राज्य और रिहाई का गणित
आपको बता दे कि कैदी राज्य सरकार की निगरानी में होता है इसलिए राज्य की जिम्मेदारी अधिक होती है। अगर राज्य सरकार सजा कम करने की अपील करे तो कोर्ट उसे सुन लेता है।
यह भी समझना महत्वपूर्ण है कि उम्रकैद 16 साल या 30 साल या हमेशा के लिए हो सकती है लेकिन 14 साल से कम नहीं हो सकती है।
राज्य सरकार को सुनिश्चित करना होता है कि उम्रकैद की सजा वाला अपराधी 14 साल से पहले रिहा न हो। 30 साल एक लंबा वक्त होता है।
जब यह मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा तो इस कालखंड की चर्चा प्रमुखता से की गई। शीर्ष अदालत को भी कहना पड़ा कि जब जेल में कम समय की सजा काटने वाले लोगों को रिहा किया जा रहा है, तो केंद्र सरकार पेरारिवलन को रिहा करने पर सहमत क्यों नहीं हो सकती?
सुप्रीम कोर्ट केंद्र सरकार के उस जवाब से भी नाराज हुआ जिसमें कहा गया कि तमिलनाडु के राज्यपाल ने दोषी को रिहा करने के राज्य मंत्रिमंडल के फैसले को राष्ट्रपति को भेज दिया है जो दया याचिका पर निर्णय लेने के लिए सक्षम अथॉरिटी हैं।
इसपे सुप्रीम कोर्ट ने साफ कहा कि प्रथम दृष्टया राज्यपाल का यह फैसला गलत और संविधान के खिलाफ है क्योंकि वह राज्य मंत्रिमंडल की सिफारिश से बंधे हैं। उनका फैसला संविधान के संघीय ढांचे पर प्रहार करता है।
उसी समय न्यायमूर्ति एलएन राव और न्यायमूर्ति बी आर गवई की पीठ ने अपनी मंशा स्पष्ट कर दी थी कि वह पेरारिवलन की दलील को स्वीकार कर अदालत के पहले के फैसले के अनुरूप उसे रिहा कर देगी। आज वही हुआ।
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