क्या भारत के राज्यों के बीच बातचीत में हिन्दी होगी प्राथमिकता?
केंद्रीय गृह मंत्रालय द्वारा जारी एक बयान के अनुसार संसदीय राजभाषा समिति की 37वीं बैठक की अध्यक्षता करते हुए गृह मंत्री अमित शाह ने कहा कि सरकार चलाने का माध्यम हिन्दी भाषा होगी और यह निश्चित तौर पर हिंदी के महत्व को बढ़ाएगा।
इस दौरान उन्होंने कहा कि हिंदी को स्थानीय भाषाओं के विकल्प के रूप में नहीं बल्की अंग्रेजी के विकल्प के रूप में स्वीकार करना चाहिए। बैठक के दौरान गृह मंत्री ने समिति सदस्यों की सर्वसम्मति से समिति की रिपोर्ट के 11वें खंड को राष्ट्रपति के पास भेजने को मंज़ूरी दी।
हिंदी को लचीला बनाने पर दिया जाए जोर
इस अवसर पर अमित शाह ने कहा कि जब तक हम अन्य स्थानीय भाषाओं के शब्दों को स्वीकार करके हिंदी को लचीला नहीं बनाएंगे तब तक इसका प्रचार-प्रसार नहीं किया जा सकेगा। उन्होंने कहा कि अब समय आ गया है कि राजभाषा को देश की एकता का महत्वपूर्ण अंग बनाया जाए।
इस बीच, शाह ने कहा कि जब राज्यों के नागरिक एक-दूसरे से संवाद करते हैं, तो उनके बीच वार्ता एक भारतीय भाषा में होनी चाहिए, चाहे वह भाषा क्षेत्रीय हो या राज्य-विशिष्ट भाषा। केंद्रीय गृह मंत्री ने समिति के सदस्यों को बताया कि अब कैबिनेट के एजेंडे का 70 फीसदी हिस्सा हिंदी में तैयार किया गया है।
शाह ने की राजभाषा समिति की तारीफ
इस दौरान उन्होंने कहा कि वर्तमान राजभाषा समिति जिस गति से काम कर रही है, वह शायद ही पहले कभी देखी गई हो। गृहमंत्री शाह ने कहा कि समिति के एक ही कार्यकाल में भारत के राष्ट्रपति को तीन रिपोर्ट भेजना सभी की संयुक्त उपलब्धि है।
कैसे हिंदी बनी राजभाषा
साल 1947 में जब अंग्रेजी हुकूमत से भारत आजाद हुआ तो उसके सामने भाषा को लेकर सबसे बड़ा सवाल था। क्योंकि भारत में सैकड़ों भाषाएं और बोलियां बोली जाती हैं। ऐसे में कौन सी राष्ट्रभाषा चुनी जाएगी ये काफी अहम मुद्दा था।
काफी सोच विचार के बाद हिंदी और अंग्रेजी को नए राष्ट्र की भाषा चुना गया। संविधान सभा ने देवनागरी लिपी में लिखी हिंदी को अंग्रजों के साथ राष्ट्र की आधिकारिक भाषा के तौर पर स्वीकार किया था। 14 सितंबर 1949 को संविधान सभा ने एक मत से निर्णय लिया कि हिंदी ही भारत की राजभाषा होगी।
विदित हो कि 26 जनवरी, 1950 को जब हमारा संविधान लागू हुआ तो इसमें देवनागरी में लिखी जाने वाली हिंदी सहित 14 भाषाओं को आठवीं सूची में आधिकारिक भाषाओं के रूप में रखा गया था।
संविधान के मुताबिक 26 जनवरी, 1965 में हिंदी को अंग्रजी के स्थान पर देश की आधिकारिक भाषा बनना था और उसके बाद हिंदी में ही विभिन्न राज्यों को आपस में और केंद्र के साथ संवाद करना था।
1963 में ‘राजभाषा कानून’ पारित किया गया
लेकिन दक्षिण भारत के राज्यों में रहने वालों को डर था कि हिंदी के लागू हो जाने से वे उत्तर भारतीयों के मुकाबले विभिन्न क्षेत्रों में कमजोर स्थिति में हो जाएंगे।
हिंदी को लागू करने और न करने के आंदोलनों के बीच वर्ष 1963 में ‘राजभाषा कानून’ पारित किया गया, जिसने 1965 के बाद अंग्रेजी को राजभाषा के तौर पर इस्तेमाल न करने की पाबंदी को खत्म कर दिया।
हालांकि, हिंदी का विरोध करने वाले इससे पूरी तरह संतुष्ट नहीं थे और उन्हें लगता था कि पंडित जवाहर लाल नेहरू के बाद इस कानून में मौजूद कुछ अस्पष्टता फिर से उनके विरुद्ध जा सकती है।
भारत के बहुभाषी होने की वजह से हिंदी को नहीं मिल रहा है बढ़ावा
भारत बहुभाषी देश है जहां अलग-अलग क्षेत्रों की अलग-अलग भाषाएं और बोलियां हैं। उनमें से किसी का भी महत्व हिंदी से कम नहीं है, लेकिन राष्ट्रीय स्तर पर कोई एक ऐसी भाषा नहीं है, जिसे सभी राज्यों या इलाकों को जोड़ने वाली भाषा का दर्जा प्राप्त हो।
हालांकि, अतीत में भाषा को लेकर जिस तरह के विवाद हो चुके हैं, उनके मद्देनजर हिंदी को बढ़ावा देते समय यह भी ध्यान रखना होगा कि इसकी वजह से दूसरी भाषाओं पर कोई नकारात्मक असर न पड़े।
सरकारी स्तर पर बढ़ावा देने की जरूरत
उत्तर भारत के लगभग सभी हिस्सों में साधारण लोगों की बोलचाल, पढ़ाई-लिखाई से लेकर संस्थागत स्तर तक हिंदी को जगह मिली हुई है। लेकिन, इसके अलावा भी देश के ज्यादातर इलाकों में हिंदी ने जो जगह बनाई है, उसमें इसके विकास और प्रसार की बड़ी संभावनाएं हैं।
पर यह तभी संभव हो पाएगा जब सरकार के स्तर पर इसके प्रयोग को बढ़ावा दिया जाएगा और कुछ मामलों में इसे अनिवार्य भी बनाया जाएगा।
पूर्वोत्तर के राज्यों में हिंदी को दिया जा रहा बढ़ावा
अमित शाह ने कहा कि पूर्वोत्तर के आठ राज्यों में हिंदी को बढ़ावा दिया जा रहा है। इसके लिए वहां 22,000 हिंदी शिक्षकों की भर्ती की गई है।
साथ ही, उत्तर पूर्व के नौ आदिवासी समुदायों ने अपनी बोलियों की लिपियों को देवनागरी में बदल दिया है। इसके अलावा, पूर्वोत्तर के सभी आठ राज्यों में दसवीं कक्षा तक के स्कूलों में हिंदी अनिवार्य करने पर सहमति बनी है।
अमित शाह ने तीन बिंदुओं पर दिया जोर
केंद्रीय गृह मंत्री ने बैठक के दौरान तीन मुख्य बिंदुओं पर जोर दिया। उन्होंने गृह मंत्री ने तीन मुख्य बिंदुओं पर जोर दिया। एक यह है कि समिति से अनुरोध है कि रिपोर्ट के पहले से 11वें खंड तक की गई सिफारिशों के कार्यान्वयन के लिए जुलाई में एक बैठक आयोजित की जाए।
दूसरे बिंदु के तहत उन्होंने कक्षा 9 तक के छात्रों को हिंदी का प्रारंभिक ज्ञान देने और हिंदी शिक्षण परीक्षाओं पर अधिक ध्यान देने की आवश्यकता पर जोर दिया। तीसरे बिंदु के तहत गृह मंत्री ने हिंदी शब्दकोश को संशोधित कर पुनः प्रकाशित करने का सुझाव दिया।
शाह ने यह भी कहा कि सभी संबंधित सचिवों के साथ बैठक के बाद राजभाषा समिति की रिपोर्ट के पहले से 11वें खंड की सिफारिशों को लागू करने की प्रगति की समीक्षा के लिए एक कार्यान्वयन समिति का गठन किया जाना चाहिए।
इस दौरान राजभाषा समिति के अध्यक्ष अमित शाह ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने फैसला किया है कि सरकार चलाने का माध्यम राजभाषा है और इससे निश्चित रूप से हिंदी का महत्व बढ़ेगा।
बैठक में केंद्रीय गृह राज्य मंत्री अजय कुमार मिश्रा और निशीथ प्रमाणिक, राजभाषा संसदीय समिति के उपाध्यक्ष भर्तृहरि महताब और समिति के अन्य सदस्य भी मौजूद थे।
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